आज हम जिस ‘काम के बदले अनाज योजना’ के बारे में बात कर रहे हैं, वो भारत की सबसे महत्वपूर्ण rural development schemes में से एक रही है। तो आखिर kam ke badle anaj yojana kya hai aur kab shuru hui? सीधे शब्दों में कहें तो, यह एक ऐसी सरकारी पहल थी जिसका मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को रोजगार देना और साथ ही उन्हें food security, यानी खाद्य सुरक्षा प्रदान करना था। इस scheme के तहत, जो भी गरीब व्यक्ति manual unskilled labour, यानी शारीरिक श्रम करने को तैयार होता था, उसे मजदूरी के रूप में पैसे की जगह अनाज दिया जाता था। यह योजना देश में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी की तिहरी चुनौतियों से निपटने के लिए एक बहुत बड़ा कदम थी।
इस योजना का इतिहास काफी दिलचस्प है और यह दो मुख्य चरणों में विकसित हुई। पहली बार ‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम को 1977-78 के दौरान लॉन्च किया गया था। उस समय इसका उद्देश्य देश के ग्रामीण गरीबों को काम देकर खाद्य सुरक्षा देना था, जिसमें वे कच्चे रास्ते बनाने या मलबा हटाने जैसे काम करते थे। हालांकि, इस योजना को एक नया और ज्यादा structured रूप मिला 14 नवंबर 2004 को, जब तत्कालीन केंद्र सरकार ने इसे ‘नेशनल फूड फॉर वर्क प्रोग्राम’ (NFFWP) के नाम से देश के 150 सबसे पिछड़े जिलों में दोबारा लॉन्च किया। यह लॉन्च योजना आयोग, ग्रामीण विकास मंत्रालय और राज्य सरकारों के बीच सलाह-मशविरे के बाद हुआ था। यह 100% केंद्र सरकार द्वारा sponsored scheme थी, जिसका मतलब है कि इसका पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी और राज्यों को अनाज बिल्कुल मुफ्त में दिया जाता था।
Table of Contents
योजना का मुख्य उद्देश्य क्या था? (Main Objectives of the Scheme)
इस Government scheme को बहुत ही सोचे-समझे ‘objectives’ के साथ लॉन्च किया गया था। इसका लक्ष्य सिर्फ अनाज बांटना नहीं था, बल्कि एक स्थायी समाधान की तरफ बढ़ना था। आइए इसके मुख्य उद्देश्यों को points में समझते हैं:
- Supplementary Wage Employment देना: योजना का सबसे पहला और बड़ा मकसद ग्रामीण क्षेत्रों में उन लोगों के लिए रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा करना था जिनके पास साल भर काम नहीं होता।
- Food Security सुनिश्चित करना: काम के बदले सीधे अनाज देकर, सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि गरीब परिवारों को, खासकर आपदा या सूखे जैसी स्थिति में, भूखा न रहना पड़े।
- ग्रामीण Infrastructure का निर्माण: इस योजना के तहत होने वाले कामों से गांवों में टिकाऊ community assets का निर्माण करना था। इसमें सड़कें बनाना, जल संरक्षण (water harvesting) के लिए तालाब बनाना, और अन्य सामुदायिक संपत्तियों का विकास शामिल था।
- Migration को रोकना: जब लोगों को अपने ही गांव में काम मिलने लगा, तो इससे काम की तलाश में शहरों की ओर होने वाले पलायन (migration) को रोकने में भी मदद मिली।
- गरीबों की Purchasing Power बढ़ाना: प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में गरीबों की क्रय शक्ति में कमी से उन्हें बचाने का भी यह एक प्रयास था।
कौन उठा सकता था इस योजना का लाभ? (Eligibility & Beneficiaries)
यह योजना बहुत ही inclusive थी, मतलब इसे ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंदों तक पहुंचाने की कोशिश की गई थी। इस प्रोग्राम के दरवाजे उन सभी ग्रामीण गरीबों के लिए खुले थे जिन्हें मजदूरी पर आधारित रोजगार की जरूरत थी और जो अकुशल शारीरिक काम करने के लिए तैयार थे। खास बात यह थी कि इसमें BPL (गरीबी रेखा से नीचे) और APL (गरीबी रेखा से ऊपर) दोनों तरह के जरूरतमंद परिवारों को शामिल करने की छूट थी, ताकि कोई भी जरूरतमंद इससे वंचित न रह जाए। इसका सीधा target वो लोग थे जिनके पास अपनी आजीविका चलाने का कोई और साधन नहीं था।
कैसे काम करती थी यह योजना? (Working Process of the Scheme)
इस योजना का implementation process काफी सीधा और स्पष्ट था।
- केंद्र सरकार की भूमिका: केंद्र सरकार राज्यों को बिना किसी खर्च के अनाज (गेहूं और चावल) मुहैया कराती थी। 2004-05 के लिए, सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए ₹2,020 करोड़ के बजट के साथ 18 मिलियन टन अनाज आवंटित किया था।
- राज्य सरकार की जिम्मेदारी: राज्यों की जिम्मेदारी अनाज के ट्रांसपोर्टेशन, हैंडलिंग चार्ज और उस पर लगने वाले टैक्स को वहन करने की थी।
- District Level पर Implementation: जिले के स्तर पर, कलेक्टर को इस योजना का नोडल अधिकारी बनाया गया था। प्लानिंग, इम्प्लीमेंटेशन, कॉर्डिनेशन, मॉनिटरिंग और सुपरविजन की पूरी जिम्मेदारी कलेक्टर की होती थी।
- काम का चयन और मजदूरी का भुगतान: ग्राम सभा के माध्यम से यह तय किया जाता था कि गांव में किस तरह के विकास कार्यों की जरूरत है। मजदूरों को उनके काम के बदले दैनिक आधार पर अनाज के रूप में मजदूरी दी जाती थी।
सबसे बड़ा Update: जब ‘काम के बदले अनाज योजना’ बनी MGNREGA की नींव
यह इस योजना के सफर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। ‘काम के बदले अनाज कार्यक्रम’ की सफलता और इसके प्रभाव को देखते हुए सरकार ने एक और भी बड़ा और क्रांतिकारी कदम उठाने का फैसला किया। फरवरी 2006 में, नेशनल फूड फॉर वर्क प्रोग्राम (NFFWP) को पूरी तरह से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) में मिला दिया गया। बाद में इसी NREGA का नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) कर दिया गया।
यह सिर्फ एक विलय नहीं था, बल्कि एक वैचारिक बदलाव (conceptual shift) था। जहां ‘काम के बदले अनाज’ एक food supply-based programme था, वहीं MGNREGA एक ‘Right to Work’ यानी ‘काम के अधिकार’ पर आधारित कानून बन गया। इस नए कानून के तहत, सरकार हर ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक काम करने के इच्छुक हैं, एक वित्तीय वर्ष में 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी देती है।
MGNREGA के आने से योजना का स्वरूप बदल गया। अब मजदूरी का भुगतान सीधे बैंक खातों में किया जाता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है और लाभार्थियों को यह आजादी मिलती है कि वे अपनी जरूरत के हिसाब से पैसा खर्च कर सकें, चाहे वो अनाज खरीदना हो या कोई और जरूरत पूरी करनी हो। हालांकि, ‘काम के बदले अनाज’ का मूल सिद्धांत – यानी रोजगार पैदा करके ग्रामीण संपत्ति बनाना – आज भी MGNREGA के core में जीवित है।
योजना की विरासत और आज की प्रासंगिकता (Legacy and Relevance Today)
भले ही ‘काम के बदले अनाज’ नाम की योजना आज एक standalone scheme के रूप में मौजूद नहीं है, लेकिन इसकी विरासत बहुत बड़ी है। इसने भारत में social security और rural employment की politiques को एक नई दिशा दी। यह MGNREGA जैसे दुनिया के सबसे बड़े रोजगार गारंटी कार्यक्रम की नींव बना। इस योजना ने साबित किया कि रोजगार और खाद्य सुरक्षा को एक साथ जोड़कर गरीबी पर एक मजबूत प्रहार किया जा सकता है। इसने देश को दिखाया कि कैसे सरकारी हस्तक्षेप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है और संकट के समय में करोड़ों लोगों के लिए एक safety net तैयार किया जा सकता है।
अंत में, ‘kam ke badle anaj yojana kya hai aur kab shuru hui’ का जवाब सिर्फ एक तारीख या परिभाषा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे सफल प्रयास की कहानी है जिसने भारत के गांवों की तस्वीर बदलने में एक अहम भूमिका निभाई और जिसकी आत्मा आज MGNREGA के रूप में करोड़ों लोगों को सहारा दे रही है।